जन-गण-मन अधिनायक जय हे,
भारत-भाग्य-विधाता।
पंजाब-सिंधु-गुजरात-मराठा,
द्राविड़-उत्कल-बंग।
विंध्य-हिमाचल-यमुना-गंगा,
उच्छल-जलधि-तरंग।
तव शुभ नामे जागे,
तव शुभ आशिष मागे,
गाहे तव जय-गाथा।
जन-गण-मंगलदायक जय हे,
भारत-भाग्य-विधाता।
जय हे, जय हे, जय हे,
जय जय जय जय हे।
अर्थ
पंक्ति 1–2: हे भारत के भाग्य के विधाता, आपकी जय हो।
पंक्ति 3–4: पंजाब, सिंध, गुजरात, महाराष्ट्र, द्रविड़ (दक्षिण भारत), उड़ीसा और बंगाल — ये सब भारत के अंग हैं।
पंक्ति 5–6: विंध्य और हिमालय की पहाड़ियाँ, यमुना और गंगा नदियाँ, और समुद्र की लहरें — सभी तुम्हारा गुणगान करते हैं।
पंक्ति 7–9: तुम्हारे शुभ नाम से सब जागते हैं, तुम्हारा आशीर्वाद माँगते हैं और तुम्हारी जय-गाथा गाते हैं।
पंक्ति 10–13: हे सबका कल्याण करने वाले, भारत के भाग्य के विधाता — जय हो, जय हो, जय हो!